Friday, December 2, 2016

अन्तर्द्वन्द










कोई देख ना पाए, अन्तर्द्वन्द चल रहा ख़ामोशी से

ऊपर तारों का महाकुम्भ , नीचे पसरा सन्नाटा है
निंदिया ने सबपे असर किया, मै जाग रहा ख़ामोशी से

बेहद बुलंद अव्वल सपने, फीके फीके बेस्वाद लगे
बदहवास सा भाग रहा, पर पिछड़ रहा ख़ामोशी से

रौशन रुतबे का मकड़जाल, बुनते बुनते ही उलझ रहा
बाहर चिराग ले घूम रहा, भीतर अँधियारा ख़ामोशी से

मरुभूमि की तपन बढ़ रही, दहक रही ज्वाला सी रेत
मै झुलसा, दम तोड़  रहा  औ' मेघा देखे ख़ामोशी से

ढलने को है स्याह रात, आ रहा भोर ख़ामोशी से
रोज़ मात खा तंग आ गया, पर एक 'आस' ख़ामोशी से

कोई देख ना पाए, अंतर्द्वंद  चल रहा ख़ामोशी से...

-नलिनी (21Oct 2016, 4:40am)

Sunday, February 14, 2016

मुसलमान










चंद गुमराहों ने इस्लाम  पर दाग लगा डाला
ख़ुदा  के नाम पर  खौफ़ का माहौल  बना  डाला 

तय तो था गले मिलना  मेरी  ईदी  में
जालिमों ने सिर कलम करना सीख डाला

हसीनाओं का चिलमन था ये काला नक़ाब
सिरफिरो ने इसे दहशत का निशान बना  डाला 

सहमा सा बैठा हूँ मैं , खुद ही हैरान हूँ
जेहादियो की बदौलत पूरी कौम में बदनाम हूँ

मेरी  बढ़ी  हुई दाढ़ी में, सब ख़तरा देखते हैं
कतराते है सफर में , बरबस नजर फेर लेते हैं

किस किस को समझाऊ, कितना घुटता हूं मैं
क्यों कसूरवार हूँ मैं, क्योंकी  मुसलमान हूँ मैं ?

बखूबी जानता हूँ  मेरे मुल्क की सियासत को
सेक्युलर हिंदुस्तान के शातिर रहनुमाओं को

छोड़ो !  ना समझोगे तुम, ना बता पाउँगा मैं
ज़बा खोली तो खामखाँ गद्दार कहलाऊंगा मैं 

Thursday, December 10, 2015

क्या लिखूं ?














ए कलम बता, मै क्या लिखूं !

मस्जिद की पहली अज़ान लिखूं

या मंदिर का पूजा थाल लिखूं
मै तंज कसूं नेताओ पर या
अपने प्रदेश का हाल लिखूं

दुखते मन का  गुबार लिख दूँ

या रिश्तो का अदब लिहाज करूँ
तकदीर का रोना  शुरू करूँ 
कि जीवन में घुला आनंद लिखूं...

ए कलम बता, मै क्या लिखूं !


जा बैठूं पीहर के आँगन में

ममता की ठंडी छाँव लिखूं
बचपन का गुल्लक खनकाउं
या बाबुल का दुलार लिखूं

नारी का कोमल  मन लिखूं

कि निष्ठुर समाज की रीत लिखूं
मै गुरु मंत्र का ध्यान करूँ या
सखियो का गुदगुद संवाद लिखूं

ए कलम बता मै क्या लिखूं !

वो पहली पहली प्रीत लिखूं 
कि बिरहन के सिसकते गीत लिखूं 
लिख डालू तन्हाई की बातें
या महफ़िल की रंगी शाम लिखूं

मै प्रथम मिलन की लाज लिखूं
या साजन का अनुराग लिखूं
मातृत्व का अनुपम संसार लिखूं
या नित - नित की तकरार लिखूं

ए कलम बता मै क्या लिखूं !


गावों में बसता किसान  लिखूं

या शहर की भागम - भाग लिखूं
सर्दी में ठिठुरते पावं लिखूं
या महलों में बसती ठाठ लिखूं

नीला अनंत आकाश लिखूं

या सागर में छुपा मै राज़ लिखू
पूनम की उजली रात लिखूं 
या सावन की बरसात लिखूं!

ए कलम बता न क्या लिखूं ?

Friday, November 20, 2015

खुशकिस्मत



कविता लिखना भी, इज़हारे इश्क़ होता है 
कातिब-ए-यार हो जिनका, वो बहुत खुशनसीब होता है

Wednesday, November 18, 2015

जब लगे कि तू ही सर्वश्रेष्ठ















उद्द्वेलित मन जब दम्भ भरे
भीतर का अहम जब नृत्य करे
जब लगे तुझे  तू  ही सर्वश्रेष्ठ
शमशान घाट  होकर आना ॥

                                धधकती है  चहु ओर लपटें
                                मौन  स्नेही  जन  खड़े
                                विचलित ह्रदय है डगमगाता
                                'वह' स्वछन्द होकर चल दिए
क्या, कनक द्रव्य का अहंकार
है व्यर्थ,  धरा सब अलंकार
इत्र -सुगंघ में लिपटे शिथिल पढ़े
प्रियवर ही मुख पर अग्नि धरे
                                कंपित  कर से  दृढ होकर के
                                करते है   मुण्डक पर प्रहार
                                झंझोर उठेगा  हिय  अचरज में
                                है  कहाँ  सत्य  का आदि पृष्ठ ?
                                जब लगे तुझे तू ही सर्वश्रेष्ठ
                                शमशान घाट होकर आना ॥

जब पंच तत्व का यह शरीर
तजता जग को हो मूक-बहीर
आखिर ! माटी देह मिले माटी में
औ'  अग्नि से  अनल  मिले
                              चट्ट चट्ट की ध्वनि  होती हुंकार
                              धू  धू  कर जलता तत्व सार 
                              नयनो के सम्मुख सकल देह
                              होती जाती वायु  में विलीन 
                              अब कहो  अनुज,  है कौन ज्येष्ठ ?
                              जब लगे तुझे तू ही सर्वश्रेष्ठ 
                              शमशान घाट होकर आना ॥

है धन्य  यहां की  पावन भूमि
निर्भय हो जिसने कदम धरा
इस मलीन काया के मोही मन से 
तन  धवल  पुण्य  ऋणमुक्त हुआ
                             यदि जीवित स्वयं मै आ न सकूँ
                             अपनों संग आउंगी अवश्य
                             कैसा मधुर मिलन अद्भुत होगा
                             फिर सृस्टि का नया  सृजन होगा
                             उठ आवभगत करना,आलिंगन भर 
                             तू  ही  सच्चा  मित्र  घनिष्ठ
                             जब लगे तुझे तू ही सर्वश्रेष्ठ
                                शमशान घाट होकर आना ॥


काश !




काश !  मुश्ताक़ी वाली बात कभी फिर से आये
कैद करुँगी हर लम्हा, वो रात कहर की फिर आये

इधर मशगूल थे हम दुनियादारी में
वहां वो डूब रहे थे खुमारी में

दफ़्तन उनका दस्तक देना
आहिस्ता से कानो में कहना

कहते कहते वो खामोशी....

उफ़! क्यों रोका उन रेशमी जज़्बातों को
बेसुध लबो से फिसलते अल्फाज़ो को

संजीदगी को थोड़ा बहकने तो देते
जुबा पर दबे राज़  आने तो देते...


Monday, November 2, 2015

भागते बादल




पलक झपकते -रूप बदलते
भागे जाते काले बादल..
ऐसा लगता, अब उलझ गए
कुछ पल उलझे ही संग चले
पर  देखो आगे  सुलझ गए...

मुस्काता मन, बीते कल पर
घर का आँगन,  छत की रातें
धीमे - धीमे भोर की लाली
दरवाजे तक लाती धूप

नमन हाथ, रुद्राक्ष की माला
चन्दन टीका माथे वाला
हसी ठिठोली भरी दुपहरी..
अब घर की छत भी नयी नयी
आँगन भी  सबके  बदल गए
ऐसा लगता अब उलझ गए 
पर देखो,  आगे सुलझ गए...

कहीं  सूनी सूनी राते होंगी
कोई चुपके से हँसता होगा
नादानी पर , मनमानी पर
अल्हड़ मस्त जवानी पर
लो फिर से ठंडी हवा चली
यादों के सपने आँखों से गए..
ऐसा लगता अब उलझ गए
पर देखो,  आगे सुलझ गए....